लखनऊ थाना कृष्णा नगर
आज इस महामारी के समय जहां पत्रकारों की हालत बद से बदतर होती जा रही है वही आज भी जहां वर्दीधारी अपने सेवा के बल पर नए-नए कीर्तिमान रच रहे हैं वही कुछ वर्दीधारी अपने हनक में कुछ भी सुनने को तैयार नहीं होते हैं ताजा घटनाक्रम कुछ इस प्रकार है कि पत्रकार के एक साथी के सिर में तेज दर्द इस कदर उठा कि वह गिर गया तथा स्वयं गाड़ी चलाने की हालत में ना होने पर उसने अपने पत्रकार साथी को बुलाया और अपनी हालत का ब्यौरा दिया मानवीय संवेदना ओं के तहत वह पत्रकार अपने साथी को लेकर अस्पताल दिखाने की ओर चला रास्ते में पिकेडली के पीछे चेकिंग कर रहे दरोगा जी ने उन्हें रोका और तब पत्रकार के अपना आई कार्ड दिखाने के बाद और अपने साथी की हालत बयान करने के बाद भी दारोगा जी ने उनकी एक नहीं सुनी यहां तक कि कमिश्नर साहब के आदेश का हवाला दिया गया परंतु उन्होंने कुछ भी सुनने की जहमत नहीं उठाई और ₹5000 का चालान कर दिया
प्रश्न यह उठता है कि यदि किसी की तबियत खराब है तो क्या दूसरा व्यक्ति उसे कंधे पर बैठा कर लेकर जाएगा अगर अकेले व्यक्ति जाने में असमर्थ है तो क्या वह छोटी-छोटी बातों के लिए एंबुलेंस को फोन करता रहेगा जबकि कमिश्नर साहब का भी आदेश है कि आवश्यक परिस्थितियों मे दो व्यक्तियों को जाने दिया जाए