बिगुल मजदूर दस्ता और नौजवान भारत - राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020: शिक्षा से आम जन को दूर करने की योजना है
30 जुलाई चित्रकूट। छात्रों-नौजवानों और बुद्धिजीवियों के तमाम विरोध के बाबजूद केन्द्र सरकार द्वारा 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020' को मंजूरी देने के खिलाफ आज बिगुल मजदूर दस्ता और नौजवान भारत सभा ने ग्रामसभा इटहादेवीपुर मजरा भैरमपुर में विरोध प्रदर्शन किया गया। बिगुल मजदूर दस्ता के सुरेश ने कहा कि इस शिक्षा नीति के प्रावधानों के मुताबिक शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी निवेश को घटाया जाएगा जिससे देशी-विदेशी पूँजी के लिए शिक्षा में निवेश कर मुनाफा कमाने के लिए रास्ता साफ हो जाएगा। शिक्षा में निजी निवेश से स्कूलों, कॉलेजों और विश्विद्यालयों की फीस में बेतहाशा वृद्धि होगी जिसके चलते चलते व्यापक मेहनतकश जनता के बेटे-बेटियों के लिए शिक्षा प्राप्त करना और भी कठिन हो जायेगा। यह शिक्षा नीति फॉउंडेशनल स्टेज यानी पहले 5 साल की पढ़ाई (3+2) में अध्यापक की कोई जरूरत महसूस नही करती। इस काम को एनजीओ कर्मी, आँगनवाड़ी कर्मी और अन्य स्वयंसेवक अंजाम देंगे। वैसे भी यह नीति तथाकथित ढाँचागत समायोजन की बात करती है जिसका मतलब है कम संसाधनों में ज़्यादा करो यानी सरकार का अपनी ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने का प्रयास कर रही है। वैसे तो यह ड्राफ्ट 2030 तक 100% साक्षरता के लक्ष्य को पाने की बात करता है परन्तु दूसरी तरफ़ कहता है कि जहाँ 50 से कम बच्चे हों वहाँ स्कूल को बन्द कर देना चाहिए। आज स्कूलों को बढ़ाने की जरूरत है किन्तु यह नीति ठीक इसके उलट उपाय सुझा रही है। नौजवान भारत सभा के रवि ने बताया कि नयी शिक्षा नीति का मूल ड्राफ्ट शिक्षा के ऊपर जीडीपी का 6% और केंद्रीय बजट का 10% ख़र्च करने की बात करता है किन्तु साथ में ये यह भी कहता है कि यदि कर (टैक्स) कम इकठ्ठा हो तो इतना खर्च नहीं किया जा सकता।नयी शिक्षा नीति 2020 लागू होने के बाद उच्च शिक्षा के हालात तो और भी बुरे होने वाले हैं। पहले से ही लागू सेमेस्टर सिस्टम, एफवाईयूपी, सीबीडीएस, यूजीसी की जगह एचईसीआई इत्यादि स्कीमें भारत की शिक्षा व्यवस्था को अमेरिकी पद्धति के अनुसार ढालने के प्रयास थे। अब विदेशी शिक्षा माफिया देश में निवेश करके अपने कैम्पस खड़े कर सकेंगे और पहले से ही अनुकूल शिक्षा ढाँचे को सीधे तौर पर निगल सकेंगे। उच्च शिक्षा को सुधारने के लिए हायर एजुकेशन फाइनेंसियल एजेंसी ( HEFA) बनी हुई है।यूजीसी हेफा को अब अनुदान की बजाय कर्ज देगी जो हेफा विश्वविद्यालयों को देगी और विश्वविद्यालयों को यह कर्ज 10 वर्ष के अन्दर चुकाना होगा। सरकार लगातार उच्च शिक्षा बजट को कम कर रही है। लगातार कोर्सों को स्व-वित्तपोषित बनाया जा रहा है। विश्वविद्यालयों को स्वायत्ता दी जा रही है जिसका मतलब है सरकार विश्वविद्यालय को कोई फण्ड जारी नही करेगी। सरकार की मानें तो विश्वविद्यालय को अपना फण्ड, फीसें बढ़ाकर या किसी भी अन्य तरीके से जिसका बोझ अन्ततः विद्यार्थियों पर ही पड़ेगा, करना होगा। इसके पीछे सरकार खजाना खाली होने की बात करती है किन्तु कैग की रिपोर्ट के अनुसार 2007 से अब तक प्राप्त कुल शिक्षा सेस में से 2 लाख 18 हज़ार करोड़ रुपये की राशि सरकार ने खर्च ही नहीं की है।उच्च शिक्षा से जुड़े एमए, एमफ़िल, तकनीकी कोर्सों और पीएचडी के कोर्सों को भी मनमाने ढंग से पुनर्निर्धारित किया गया है। एमफिल के कोर्स को समाप्त ही कर दिया गया है। इससे सीधे-सीधे उच्च शिक्षा की गुणवत्ता के साथ खिलवाड़ होगी। नौजवान भारत सभा से जुड़े छात्रों का कहना है कि कुल मिलाकर 'नयी शिक्षा नीति 2020' जनता के हक़ के प्रति नहीं बल्कि बड़ी पूँजी के प्रति समर्पित है। शिक्षा की नयी नीति हरेक स्तर की शिक्षा पर नकारात्मक असर डालेगी। यह समय देश के छात्रों-युवाओं और बौद्धिक तबके के लिए शिक्षा के अधिकार को हासिल करने हेतु नये सिरे से जनान्दोलन खड़े करने के लिए कमर कस लेने का समय है। कार्यक्रम में राहुल, रामसलोने, रामसुमिरन, पवन, धीरेंद्र, विजय ,वीरेंद्र, रवि, सुरेश, अंकित इत्यादि लोग उपस्थित थे।