सोचा एक पत्रकार बनूंगा सच्चे पत्रकारों को समर्पित लेख जीवन में नई उमंग और उत्साह के साथ जब कार्य करने के लिए क्षेत्र का चुनाव करना था तो सोचा चलो पत्रकार बनू और समाज के लिए कुछ काम करु अपने विचारों को रखने का इससे अच्छा साधन और कोई नहीं आम जनता की सेवा तो होगी साथ ही मेरा नाम भी होगा। उस समय मोबाइल नहीं थे खबरों को कवर करने के लिए साइकिल ही सबसे उपयोगी साधन था। तो भाई लग गए एक समाचार पत्र में मेहनत और लगन से काम करना शुरू किया और पत्रकारिता की ABCD सिखाने के लिए वरिष्ठो का साथ मिला और शुरु हो गई हमारी पत्रकारिता कुछ सालों में ही बडे-बडे बैनरों में काम करने का सौभाग्य मिला। नाम कमाया अब आगे बढ़ाने के लिए अपने समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू किया और सफलतापूर्वक आज तक चल रहा हैं वह भी बेदाग। बेदाग लिखना पड़ा क्योंकि अब नये दौर की पत्रकारिता देखने को मिल रही है देश में मोबाइल पत्रकार हो गए है। जिन्होने सच्चे पत्रकारों का गला दबा दिया ये तथाकथित पत्रकार थाने चौकी में अपने ही साथी पत्रकारों की बेइज्जती करने में शेखी समझते हैं। अब पत्रकारिता समाज सेवा नहीं कमाई का जरिया बन गई लोग आपकी मजबूरी...