जनपद शाहजहांपुर में होलिका मैया नहीं यहां पूजे जाते हैं होरी बाबा
जनपद शाहजहांपुर से जितेंद्र कुमार कश्यप की रिपोर्ट
होली पर आखत डालते समय होलिका मैया के जयकारे तो हर किसी ने सुनें हैं लेकिन एक गांव ऐसा भी है जहां होरी बाबा के जयकारे लगते हैं। यहीं नहीं पूजा भी होरी बाबा के नाम से होती है। इस गांव में कई और भी अनोखी परंपरा दशकों से चली आ रही है जो शायद ही कहीं हो। हम बात कर रहे हैं शहर से सटे विकासखंड ददरौल के गांव घुसगवां की।
शाहजहांपुर होली पर आखत डालते समय होलिका मैया के जयकारे तो हर किसी ने सुनें हैं, लेकिन एक गांव ऐसा भी है जहां होरी बाबा के जयकारे लगते हैं। यहीं नहीं पूजा भी होरी बाबा के नाम से होती है। इस गांव में कई और भी अनोखी परंपरा दशकों से चली आ रही है, जो शायद ही कहीं हो। हम बात कर रहे हैं शहर से सटे विकासखंड ददरौल के गांव घुसगवां की। जहां बुजुर्गों की इस परंपरा को आज भी युवा बरकरार रखे हैं। छह हजार आबादी वाले इस गांव में एक ही स्थान पर गांव से डेढ़ किमी दूर होरी बाबा का स्थान है। जहां सुबह करीब चार बजे होलिका दहन किया जाता है। यहां शराब का प्रसाद पूरे वर्ष भर लोग मन्नतें पूरी होने पर चढ़ाते है।
ऐसे पड़ी परंपरा
पूर्व प्रधान भुवनेश्वर सिंह उर्फ मुन्ना सिंह बताते हुए है कि घुसगवां गांव में राजा भोला सिंह का किला था। जिसमें वर्ष 1466 में उनकी घुड़सवारी हुआ करती थी। तब अजमेर के राजा रामपाल ने राजा भोला सिंह की सेना पर होली वाले दिन आक्रमण कर दिया था। तब उनका एक होरी नाम के सैनिक भी युद्ध में मारे गए थे उस समय होली पर आखत डाले जा रहे थे। उसी पर सैनिक होरी समेत वहां मारे गए कुछ अन्य लोगों के शव होलिका की आग में डाल दिए थे। होरी ने गांव वालों की रक्षा में लड़ते हुए प्राण त्यागे थे। इसलिए तब से होलिका मैया के बजाय होरी बाबा की पूजा होने लगी।
आग लेकर लगती है दौड़
बुजुर्ग बताते है कि राजा भोला सिंह के एक सैनिक ने युद्ध के समय गद्दारी कर दी थी। तब से होलिका दहन से पहले गांव का एक युवक हथेली पर आग का गोला लेकर करीब 300 मीटर तक दौड़ लगाता है। इसके बाद आग का गोला उस गद्दार सैनिक के नाम पर फेंका जाता है।