राज्य स्तरीय बजट में दिव्यांगजनों की अनदेखी
जनपद/जालौन
दिव्यांगों की दशा बेहद खराब है वे खुद तो जीवट दिखा पा रहे हैं लेकिन सरकारी विभागों से मदद तो दूर उन्हें हमदर्दी तक नहीं मिलती उनके उत्थान और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए चलाई जा रही योजनाएं कागजी साबित हो रही हैं। यह निष्कर्ष दिव्यांगों के जिले में किए गए एक सर्वे में सामने आए जिसे नेशनल सेंटर फॉर प्रमोशन आफ एंप्लॉयमेंट फॉर डिसेबल्ड पीपल (एन सी पी ई डी पी) के फेलो जाविद खान ने कई गांव में जाकर दिव्यांगों की स्थिति का नजदीकी से अवलोकन करने के बाद तैयार किया है। ग्रामीण स्तर पर स्टडी के दौरान पाया कि ग्रामीण स्तर पर दिव्यांगजन को आजीविका जुटाने के लिए अनेकों माध्यम है।
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना परंतु जमीनी स्तर पर जागरूकता और दिव्यांग के हकों की पैरवी करनी होगी। 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में विकलांगों की संख्या 41 लाख 57 हजार 514 है । जो कि जनसंख्या का लगभग 2.08 प्रतिशत है। दिव्यांग व्यक्तियों से संबंधित रोजगार के मुद्दों को संबोधित करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार के 2022-2023 के बजट में प्रस्तावित किए जा सके। हालांकि, सामान्य तौर पर, वहाँ दिव्यांगजनों के लिए रोजगार के अवसरों को बेहतर बनाने में सरकार कई तरह से मदद कर सकती है।
दिव्यांग व्यक्तियों को काम पर रखने वाली कंपनियों के लिए कर प्रोत्साहन प्रदान करना। नौकरी बाजार में मांग में कौशल और योग्यता विकसित करने के लिए दिव्यांग व्यक्तियों के लिए प्रशिक्षण और शिक्षा कार्यक्रम प्रदान करना। कार्यस्थल में समावेश और विविधता को बढ़ावा देने वाली नीतियों और प्रथाओं को बढ़ावा देना। यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि दिव्यांगजनों को आवास या प्रशिक्षण की कमी के अलावा रोज़गार के लिए बाधाओं का सामना करना पड़ता है। उन्हें भर्ती में भेदभाव का सामना करना पड़ता है या पदोन्नति के लिए छोड़ दिया जाता है कार्यस्थल में बढ़ती पहुंच, जैसे दिव्यांग व्यक्तियों के लिए आवास प्रदान करना। दिव्यांग व्यक्तियों के लिए नियोक्ताओं और नौकरी के अवसरों से जुड़ने के लिए एक मंच बनाना।