दो दिवसीय जगद्गुरु विश्वाराध्य जयन्ती का शुभारम्भ किया गया
वाराणसी
जंगमबाडी स्थित जंगनबाडी मठ में संस्थापक जगद्गुरु विश्वाराध्य का जयन्ती महोत्सव प्रात: ९ बजे जगद्गुरु १००८ डॉ. चन्द्रशेखर
● शिवाचार्य महास्वामी एवं १००८ हों. मल्लिकार्जुन विश्वाराध्य महास्वामी के करकमलों से पंचाचार्य ध्वजारोहण के साथ हुआ। कार्यक्रम के दूसरी श्रृंखला में प्रतिवर्ष दिया जाने वाला जगद्गुरु विश्वाराध्य विश्वभारती पुरस्कार इस वर्ष आचार्य राजाराम शुक्ल को प्रदान किया। इसी प्रकार दुसरा कोडीमठ संस्कृत साहित्य पुरस्कार सम्पूर्णानन्द विश्वविद्यालय के डॉ. द्विव्यचेतन ब्रह्मचारी को तथा इस वर्ष का आचार्य व्रजवल्लभद्विवेदी शैव भारती पुरस्कार डॉ. रमाकान्त पाण्डेय को प्रदान किया गया तथा लि. सौ.सिन्धु सुभाष म्हमाने मातृशक्ति पुरस्कार काशीहिन्दू विश्वविद्यालय की प्रो. स्वरवन्दना शर्मा को एवं जयदेव हिन्दी साहित्य पुरस्कार ख्यातिलब्ध लेखक आलोक पराडकर को तथा पं चाचार्य पंचसूत्राणि गौरव पुरस्कार प्रो. वागीश दिनकर हापुड़ उ.प्र. को प्रदान किया गया। शिवार्पण की श्रृंखला में जगद्गुरु
१००८ डॉ. चन्द्रशेखर शिवाचार्य महास्वामी के द्वारा रचित पंचाचार्य पंच सूत्राणि एवं वीरशैव आचार्य परम्परा विमर्श लेखक- डॉ. ददन उपाध्याय का शिवार्पण १००८ डॉ. मल्लिकार्जुन विश्वाराध्य शिवाचार्य महास्वामी
के करकमलों से सम्पन्न हुआ। विश्वभारती सम्मान से सम्मानित आचार्य राजाराम शुक्ल ने अपने सम्मान के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह सम्मान लिये सर्वोच्च अलंकरण है। ज्ञान सिंहासन की अटूट
परम्परा का यह मठ साक्षी है। यहां समाज के सभी साहित्यिक विकास को महत्व दिया जाता है। यतार्थतः ज्ञानसिंहासन अज्ञानरूपी नेत्रों को खोलने का मार्ग प्रशस्त करता है। कोडिमठ सम्मान से सम्मानित डॉ. द्विव्यचेतन ब्रकृमचारी जी ने कहा कि यह स्थान जगत गुरूओं के प्राकट्य का प्रमुख केन्द्र है जहां हजारो
वर्षों की परम्परा रही है। आचार्य ब्रजवल्लभ द्विवेदी शैव भारती सम्मान से सम्मानित आचार्य रमाकान्त पाण्डेय ने कहां यहां शैवागम साहित्य के सृजन की एक बहुत प्राचीन परम्परा है शैवागमों के यह मठ सर्वदा अग्रणीय रहा है। प्रो. वर वन्दना शर्मा ने अपने स्वागत के प्रतित्तोर में कहा कि इसके स्थापना
उन्नयन में काल से माँ सरस्वती का वरदहस्त रहा है। यही कारण है कि यह सम्पूर्ण भारत में प्रसिद्धि को प्राप्त है।
से आये प्रो. वागीश दिनकर ने कहा कि इस मठ की पंचाचार्यों की जो परम्परा है वैसी परम्परा किसी अन्य हापुड स्थान पर देखने को नहीं मिलती मैनें पंचाचार्य परम्परा का समुल अध्ययन करने के बाद एवं कृति का प्रणयन किया है। ख्यातिप्राप्त लेखक एवं पत्रकार श्री आलोक पराडकर ने कहा कि यहां के साहित्यीक कृतियों का हिन्दी अनुवाद होने के कारण मुझे अध्ययन करने का अवसर प्राप्त हुआ। मठ में ज्ञान गंगा की भी
गंग धारा निरन्तर बहती रहती है। यह हम काशीवासियों के लिए एक तीर्थ के समान है। समारोह की अध्यक्षता करते हुए डॉ. चन्द्रशेखर शिवाचार्य महास्वामी ने कहा कि इस मठ को काशी के विद्वानों का पुराकाल से ही विद्या का सम्बन्ध रहा है और उसके फलस्वरूप मठ ने अब तक ९० आगमशास्त्र के ग्रन्थों
का प्रकाशन सम्भव हो सका है। जगद्गुरू १००८ डॉ. मल्लिकार्जुन ने कहा कि यहा कोई प्रान्तववाद नहीं है
केवल विद्यावाद की पूजा होती है। महाशिवरात्रि के अवसर पर चारों ओर लघुभारत का रूप देखने को मिलता है। मठ परिवार की ओर से आये हुए सभी २५० विद्वानों का सम्मान किया गया।